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सहा दंश हमने है तुझको सहाया

सहा दंश हमने है तुझको सहाया
पता है हमे प्यार तुमने लुटाया ।
गरीबी के ऑसू लिए नैन ढोये
भिगोया है तुमने और हमने नहाया ।।

कहाँ पर कही थे कही जा रहे थे
मगर बीत रागी वही आ रहे थे ।
घुटन थी सुबह का पता भी नही था ।
हवा बनके आयी सपन पा रहे थे ।।
 तुम्ही प्रात किरणे सघन छाह हो तुम ।
पपीहे की बस्ती मेरी चाह हो तुम ।
नशीली हो राते भरी भौर गहरी
उजाला भी हो तो मेरी थाह हो तुम ।।
डा दीनानाथ मिश्र

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4 Comments

कहीं थे कहीं जा रहे थे होगा ,,, कही थे कही जा रहे,,,, कही के स्थान पर कहीं होगा

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बेहतरीन अभिव्यक्ति

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Abhinav ji

02-Aug-2023 06:29 AM

Very nice 👍

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